सामाजिक कार्यों में त्याग और समर्पण भाव जितना अधिक होगा, सफलता उतना ही सुखद अनुभव देगी ।

डॉ. अम्बेडकर युग सेवा समिति (DAYS), इंदौर – म.प्र. एक सामाजिक संगठन है, जिसका गठन अप्रैल 2016 में किया गया। समाजसेवा के क्षेत्र में समिति अपनी एक अलग पहचान रखती है। गठन के समय समिति का नाम "डॉ. अम्बेडकर युवा समिति (DAYS)" रखा गया एवं 14 अप्रैल 2023 में समिति का नाम परिवर्तन करके "डॉ. अम्बेडकर युग सेवा समिति (DAYS)" किया गया।
इसका उद्देश्य अपने अनोखे विचारों द्वारा रचनात्मक रूप और तरीकों से शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्तदान, स्वच्छता, नशा मुक्ति अभियान सहित विभिन्न क्षेत्रों में समाजसेवा करते हुए लोगों को डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर जी सहित विभिन्न महापुरुषों के जीवन संघर्ष व विचारों तथा भारतीय संविधान के प्रति जागरूक करना है।
कार्यशैली – इंदौर शहर के शासकीय-अर्धशासकीय कार्यालयों में उच्च अधिकारियों को तथा शैक्षणिक संस्थानों सहित सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े सेवाभावी व विशिष्ट व्यक्तियों को समय-समय पर डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी की तस्वीर भेंट की जाती है।

समता • स्वतंत्रता • न्याय • बंधुता - एक महापुरुष की प्रेरणादायक यात्रा
( संक्षिप्त जानकारी )
असंख्य शोषित-वंचितों के मसीहा भारत रत्न, भारतीय संविधान निर्माता डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू छावनी में हुआ। यही पर उनका स्मारक बना हुआ है जिसे डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जन्मभूमि स्मारक के नाम से जाना जाता है। महू छावनी में उनके पिता रामजी सकपाल ब्रिटिश भारतीय सेना में 1888 से 1893 तक 107वीं पायनियर्स रेजिमेंट में सूबेदार रहे और सेवानिवृत्त होने के बाद 1893-1894 के आसपास अपने परिवार के साथ महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के दापोली (Dapoli) चले गए।
जन्मभूमि की खोज व स्मारक निर्माण - डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी की जन्भूमि खोजने का श्रेय महाराष्ट्र के भंते धर्मशील जी को जाता है। 1970 के दशक में भंते धर्मशील जी बाबा साहब की जन्मभूमि की खोज करते-करते महू तक पहुंचे। काफी संघर्षो के बाद बाबा साहब के पिता रामजी सकपाल का रिकॉर्ड निकलवाया और जब इस बात की आधिकारिक पुष्टि हुई की यही डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी का जन्मस्थान है तो वहां पर जन्मभूमि स्मारक बनाने के लिए उन्होंने डॉ. अम्बेडकर मेमोरियल सोसायटी का गठन किया और जमीन प्राप्त करने के लिए आर्मी और सरकार से लंबे समय तक पत्राचार, मुलाकात और चर्चा की। काफी संघर्ष और लगातार प्रयास से 1976 के दौर में उन्हें स्मारक के लिए 22,500 वर्गफुट जमीन मिली। और परिणाम स्वरुप 14 अप्रैल 1991 को बाबा साहब की 100वीं जयंती के अवसर पर मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा जी ने जन्मस्थल पर स्मारक की आधारशिला रखी। निर्माण के बाद लगभग 4.5 एकड़ जमीन में फैले इस भव्य स्मारक का उद्घाटन 14 अप्रैल 2008 को हुआ।

स्मारक को बौद्ध धम्म पद्धति के आधार पर बनाया गया है। सफ़ेद रंग के मार्बल से बने इस स्मारक में अशोक चक्र के साथ ही डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी की आदमकद एक भव्य प्रतिमा केंद्र में स्थापित है और साइड में छोटी प्रतिमा भी स्थापित है। स्मारक के भीतर दिवार पर बाबा साहब के जीवन दर्शन से जुड़े भित्तिचित्र बने हुए है। स्मारक में नीचे मुख्य हाल के केंद्र में स्मारक की प्रतिकृति में अनुयायियों के दर्शनार्थ बाबा साहब का अस्थि कलश रखा हुआ। इसी हॉल में डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी को एक कुर्सी पर बैठे हुए और उनके पास उनकी पत्नी रमाबाई अम्बेडकर जी को साथ खड़े दिखाया गया है। स्मारक के ऊपर वाले हॉल में तथागत गौतम बुद्ध और 14 अक्टूबर 1956 में नागपुर में बाबा साहब को बौद्ध धम्म की दीक्षा देने वाले भन्ते चंद्रमणी महास्थविर जी की प्रतिमा है। जिनके समक्ष बाबा साहब अम्बेडकर अभिवादन की मुद्रा में खड़े है ऐसा दिखाया गया है।
नाम परिवर्तन - बाबा साहब के सम्मान में तत्कालीन सरकार ने जून 2003 में मध्यप्रदेश के इंदौर जिला स्थित महू का नाम परिवर्तन कर डॉ. अम्बेडकर नगर किया। डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी की जन्मभूमि देश-विदेश में ख्याति प्राप्त है। यहाँ पर देश-विदेश से डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी के अनुयायी उनसे सम्बंधित दिनों के साथ ही रोजाना भी उन्हें नमन करने आते रहते है। किन्तु बाबा साहब की जयंती के अवसर पर हर वर्ष 14 अप्रैल को यहाँ रैली के रूप में पुरे हर्षोउल्लास के साथ लाखो की संख्या में बाबा साहब के अनुयायी अस्थि कलश के दर्शन और बाबा साहब को नमन करने आते है।

डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) से अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1921 में 'द प्रोविंशियल डिसेंट्रलाइजेशन ऑफ इम्पीरियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया' (The Provincial Decentralization of Imperial Finance in British India) पर शोध के लिए M.Sc. (Master of Science) और 1923 में D.Sc. (Doctor of Science) की उपाधि प्राप्त की। 1921-1922 के बीच में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान बाबा साहब लंदन में 10 किंग हेनरीज़ रोड, कैम्बडेन में स्थित जिस मकान में रहे उसे महाराष्ट्र सरकार ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी के नेतृत्व में 2015 में अधिग्रहित करके संग्रहालय के रूप में विकसित किया। जिसका उदघाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 14 नवंबर 2015 में किया।
बौद्ध धम्म व डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी के अनुयायियों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र नागपुर स्थित दीक्षाभूमि स्मारक भी है। यहाँ पर डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी ने 14 अक्टूबर 1956 को सम्राट अशोका विजयादशमी के अवसर पर महास्थविर चंद्रमणी जी से बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। उनके साथ छः लाख से अधिक अनुयायियों ने भी बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। इस दौरान नागपुर की यह भूमि तथागत गौतम बुद्ध के त्रिशरण-पंचशील की गाथा और बाबा साहब द्वारा बौद्ध धम्म के अनुसरण हेतु अपने अनुयायियों को दी गई 22 प्रतिज्ञाओं से गुंजायमान हो उठी थी। दीक्षाभूमि के स्तूप के मुख्य द्वार के सामने, तथागत बुद्ध की प्रतिमा के पास, डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी की अस्थियों का कलश काँच में संरक्षित है। बाहर गार्डन में तथागत बुध्द और बाबा साहब की प्रतिमा के साथ ही 22 प्रतिज्ञाओं का बड़ा शिलालेख और भारतीय संविधान उद्देशिका का शिलालेख और बोधि वृक्ष भी है। स्मारक के चारो तरफ चार बड़े साँची द्वार बने हुए है। दीक्षाभूमि स्मारक पर 14 अक्टूबर और विजयादशमी (धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस) के अवसर पर बौद्ध धम्म व डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी के लाखो अनुयायी आते है। महाराष्ट्र सरकार ने दीक्षाभूमि को ए-क्लास पर्यटन स्थल का दर्जा प्रदान किया है।


26 अलीपुर रोड, दिल्ली में स्थित यह एक प्रमुख संग्रहालय है। यहाँ डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी ने अंतिम सांस ली थी। इस स्मारक को एक खुली हुई किताब की तरह बनाया गया है, जो ज्ञान के प्रतीक के रूप में डिज़ाइन की गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 21 मार्च 2016 में इस स्मारक की आधारशिला रखी व 13 अप्रैल 2018 को इसका लोकार्पण किया। यहाँ 12 फ़ीट ऊँची बाबा साहब की कांस्य प्रतिमा, अशोक स्तंभ की प्रतिकृति, संगीतमय फव्वारा, तथागत बुद्ध की प्रतिमा सहित ध्यान कक्ष बना हुआ है। ऑडियो-विजुअल तकनीक द्वारा बाबा साहब के जीवन व संघर्ष को दर्शाती प्रदर्शनियां बेहद रोचक व प्रेरणादायी है। यहाँ पर तथागत बुद्ध के हाथो की विभिन मुद्राए भी दिखती है और साथ ही साँची द्वार की प्रतिकृति भी है। यह पूरा स्मारक आधुनिकता व बौद्ध धम्म पारम्परिक संरचना का एक अनूठा निर्माण है।
महाराष्ट्र के मुंबई शहर के दादर में समुद्र तट के पास डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी का बौद्ध धम्म पद्धति से अंतिम संस्कार किया गया। यहाँ पर डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी के अस्थि अवशेष है, जिसे नमन करने हेतु प्रत्येक वर्ष 6 दिसंबर महापरिनिर्वाण दिवस पर लाखों अनुयायी यहाँ आकर बाबा साहब को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। स्तूप आकार में बने चैत्य भूमि स्मारक का उद्घाटन उनकी बहू आदरणीय मीराताई यशवंतराव अम्बेडकर जी ने 5 दिसंबर 1971 को किया था। यहाँ साँची द्वार की प्रतिकृति के रूप में विशाल प्रवेश द्वार और अशोक स्तम्भ की प्रतिकृति भी स्थापित है। व स्तूप आकार में बने स्मारक में तथागत बुद्ध और बाबा साहब की प्रतिमा स्थापित है। वर्ष 2012 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने चैत्य भूमि स्मारक के पास एक बाबा साहब के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्मारक के निर्माण के लिए इंदु मिल्स की ज़मीन महाराष्ट्र सरकार को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी थी, जहाँ वर्तमान में निर्माणकार्य जारी है।


डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी बड़ौदा (वडोदरा) राज्य के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ जी द्वारा दी गई छात्रवृत्ति के तहत अमेरिका व लन्दन में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे किन्तु उन्हें अपनी उच्च शिक्षा अधूरी छोड़कर बड़ौदा आना पड़ा। क्योंकि उन्होंने महाराजा को वचन दिया था कि वे तय समय अनुसार उनकी रियासत में आकर काम करेंगे। इसी वचन के तहत बाबा साहब बड़ौदा पहुंचे। किन्तु यहाँ सबसे बड़ी समस्या उनके लिए पहले यह बनी की वे रहेंगे कहाँ ? जैसे-तैसे उन्हें एक पारसी धर्मशाला में रहने को जगह मिली। बड़ौदा राज्य के सैनिक सचिव के रूप में उन्होंने कार्य करना भी शुरू किया। किन्तु यहां बाबा साहब उच्च शिक्षा प्राप्त करके इस पद पर कार्यरत होने के बावजूद वहा के सहकर्मियों द्वारा उनके साथ किये जा रहे जातिगत भेदभाव से दुखी थे। जातिगत भेदभाव करने वाले लोग उस धर्मशाला में भी पहुंच गए जहां बाबा साहब रह रहे थे। वहाँ से बाबा साहब को लोगो की भीड़ ने शाम तक कमरा खाली करने के लिए कहा। बाबा साहब 11 दिन तक उस कमरे में रहे किन्तु अब इस भेदभाव के चलते उन्हें वो कमरा खाली करना था। इस घटना से और इस व्यवहार से बाबा साहब काफी दुखी थे। उन्होंने अपने दो मित्रो से उनके घर रहने का पूछा किन्तु मित्रो ने भी मदद नहीं की।
मुंबई जाने का फैसला - दुखी होकर उन्होंने बड़ौदा से मुंबई जाने का फैसला किया। उस वक़्त शाम के चार बज रहे थे। और मुंबई जाने वाली ट्रैन रात नौ बजे की थी। इसलिए बाबा साहब पास में ही स्थित सयाजीबाग (कमाठी बाग) चले गए और वहां एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गए। उनकी आँखों में आंसू और दिमाग में कई सवाल थे। बाबा साहब वहां आठ बजे तक बैठे रहे और वहा से पारसी धर्मशाला गए और उसका किराया चुकाकर अपना सामान लेकर बड़ौदा की नौकरी छोड़कर मुंबई आ गए।
किन्तु जब वे सयाजीबाग (कमाठी बाग) में बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे तब उन्होंने एक ऐतिहासिक संकल्प लिया: "आज से मेरा कुटुंब वह समस्त करोड़ों/असंख्य शोषण गुलामी भरा जीवन जीने वाले मानव हैं... मैं संकल्प करता हूं कि देश के मानवों में समानता, मानवता, बंधुता के स्थापत्य के लिए जीवन के अंतिम सांस तक संघर्ष जारी रखूंगा।" 23 सितम्बर 1917 को लिए गए इस संकल्प पर बाबा साहब ने जीवनभर कार्य किया और भारतीय संविधान में सभी नागरिको को समता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुता की राह दी।
14 अप्रैल 2006 को इस स्थान का "संकल्प भूमि" के रूप में नामकरण किया गया। इस संकल्प की याद में यहाँ गुजरात सरकार द्वारा निर्मित एक स्मारक का उदघाटन होना है। जिसे "संकल्प भूमि स्मारक" के नाम से जाना जायेगा।
डॉ. अम्बेडकर युग सेवा समिति (DAYS)

"मालव रत्न"
मुरलीधर राहुल मेटांगे (सर)

ईश्वर तायड़े

भीमराव सरदार

रघुवीर मरमट

भारत निम्बाड़कर

योगेंद्र गवांदे

लोकेश पिसे (लक्की)